हमें मॉल अच्छा तो लगता, है मगर संडे को।

28/11/2010 12:05

 दक्षिण पश्चिम दिल्ली में योजना स्वरूप पैदा किया गया एक इलाका है द्वारका। उसके सेक्टर पांच की हाउसिंग सोसाइटी के भीतर एक आइसक्रीम कार्ट पर नजर पड़ गई। अपने आप में संपूर्ण किराने की दुकान। इस दुकान में सब कुछ है। शेविंग क्रीम, टूथपेस्ट, मंजन, सॉस, शैंपू, रेजर, कोल्ड ड्रिंक्स, मैगी, साबुन, सर्फ, मच्छर मारने वाला हिट, माचिस, ब्रेड, अंडा, दही, दूध आदि। चावल-दाल के छोटे पैकेट भी हैं। ज्यादा बड़ा ऑर्डर करना है, तो फोन कर दीजिए, शाम तक सामान आ जाएगा। यह ठेला-दुकान सोसाइटी के अंदर खड़ी है। सोसाइटी की कमेटी के आदेश से

 यानी हम खुदरा दुकानों से घिरे बिना नहीं रह सकते। आप चाहें हर सेक्टर में मार्केट दे दें, मगर हम आदतन दुकान को अपने पड़ोस में ही देखना चाहते हैं। द्वारका के हर सेक्टर के लिए अलग से शॉपिंग कांप्लेक्स हैं। हर अपार्टमेंट से शॉपिंग कांप्लेक्स की दूरी पांच सौ मीटर से कम नहीं। लोगों के पास वक्त कम है। इसलिए भाई लोगों ने डोर डिलीवरी का जुगाड़ खोज लिया।

हमें मॉल अच्छा तो लगता, है मगर संडे को। बाकी दिन हम किराने वाले से टकराते हैं। हमारे भीतर से मोहल्ला सिस्टम वाला सुकून अभी गया नहीं है। अपार्टमेंट बनाने वाले आर्किटेक्ट भूल गए कि हम खुदरा दुकानों के प्रति सहनशील लोग हैं। किसी ने रिटेल शॉप के लिए सोसाइटी के भीतर प्लानिंग नहीं की। दुकान हमारे लिए सेक्टर नहीं है, बल्कि घर का हिस्सा है। इसीलिए जहां भी सोसाइटी खुलती है, उसके गेट पर सबसे पहले कपड़े प्रेस करने वाले का स्वागत किया जाता है। धीरे-धीरे गेट के आसपास आइसक्रीम की ठेलागाड़ी खड़ी होने लगती है। फिर सब्जी और फल वाला ठेला लेकर खड़ा हो जाता है। हर सोसाइटी के बाहर खंभे पर कई दुकानों के नंबर ठोंक दिए गए हैं। सोसाइटी के बाहर का स्पेस अस्थायी बाजार से भर जाता है।
इस तरह देखें, तो रिटेल का भी रिटेलीकरण होने लगा है। हम बड़े-बड़े मॉल से घिर गए हैं। फिर भी लघुतम दुकानों की महिमा अपरंपार बनी हुई है। पान की दुकान परचून की दुकान हो गई है। सिगरेट के अलावा वहां ब्रेड, अंडा, चिप्स, मिनरल वॉटर का मिलना बता रहा है कि कई अपार्टमेंट के बीच बने हाई-फाई जनरल स्टोर या मार्ट फेल हो रहे हैं। अच्छा होता, अगर हर सोसाइटी में कपड़ा प्रेस करने वाले के लिए एक सुंदर-सी जगह बना दी जाती। एक छोटी-सी दुकान दे दी जाती। मगर हो यह रहा है कि कई बड़ी सोसाइटी अपने सामने के हिस्से को कॉमर्शियल एरिया में बदल रही है। कुछ सिटी टाइप सोसाइटी मिनी मॉल का निर्माण कर रही है। कई सोसाइटी तो अपनी बाउंडरी लाइन पर एटीएम काउंटर भी खोलने दे रही है। हर सोसाइटी में एक मंदिर भी बनने लगा है। जाहिर है, पुराना मोहल्ला सिस्टम हाउसिंग सोसाइटियों में चुपके-चुपके घुसने लगा है। हाउसिंग सोसाइटियों की प्लानिंग देखें, तो नीयत में एक किस्म का विस्थापन दिखता है। बड़ी-बड़ी सड़कें, अपनी दीवारें, अपना गेट। गेट पर पांच तरह के निर्देश। सोसाइटी में रहने वाले सिटीजन के अलावा बाकी सबको गेट से दूर ठेला जा रहा है। गैर सोसाइटी सिटीजन की कार अंदर नहीं आएगी। सोसाइटी सिटीजन की कार के लिए अलग से स्टिकर होता है। आगंतुक के लिए कई नियम बना दिए गए हैं। आने से पहले रजिस्टर पर साइन करो। इससे कुछ सुविधा तो है, मगर अजनबीयत का भाव और गहरा जाता है। इन रजिस्टरों का अध्ययन करें, तो पाएंगे कि एक किस्म के विरोध और झुंझलाहट में दस्तखत किए गए हैं। कई बार तो आगंतुक दरबान से झगड़ा भी कर बैठते हैं। मेरे बड़े भाई मिलने आए, तो गेट पर ही झगड़ बैठे। सोसाइटी भले उनके और मेरे बीच फर्क करे, मगर भाई साहब के लिए तो मेरा घर भी उन्हीं का है और वह अपने घर में आने के लिए पहचान क्यों साबित करें।
रोजाना होने वाले झगड़े बताते हैं कि ज्यादतर लोगों को यह व्यवस्था स्वीकार करने में दिक्कत आती है। अब कौन कार से उतरकर रजिस्टर पर साइन करे। दरबानों से पूछिए कि उन्हें किस तरह डांट खानी पड़ती है। रजिस्टर सिस्टम बेकार साबित हो रहे हैं। फिर भी लोग इनकी समीक्षा करने से कतराते हैं। इसके बाद भी सोसाइटी से माल गायब हो रहे हैं। सुरक्षा का इंतजाम निजी स्तर पर नहीं हो सकता। फ्लैट में चोरियां हो रही हैं। जब तक इन दरबानों के अधिकार स्पष्ट नहीं किए जाएंगे, तब तक इनका होना-न होना बराबर है।
दरअसल हमें हाउसिंग सोसाइटी और पुराने मोहल्ला सिस्टम की कुछ खूबियों को मिलाकर नए सिरे से प्लानिंग करनी चाहिए। सोसाइटी के सिटीजन एक दूसरे से कम परिचित होते हैं, इसलिए इनमें असुरक्षा भाव ज्यादा होता है। पुराने मोहल्ला या शहरी सिस्टम में लोग पड़ोसी के रिश्तेदार तक का नाम और गांव जानते थे। घर से निकलिए, तो बाहर बुढ़ापा काट रहे कोई दादा जी टोक देते थे कि कहां से आ रहे हो और किसके घर जा रहे हो।
साफ है कि सोसाइटी की हमारी प्लानिंग में सामाजिकता की बड़ी कमी है। यह कहानी सिर्फ दिल्ली की नहीं है। भोपाल, जयपुर, मेरठ हर शहर एक जैसे हो रहे हैं। वहां भी गार्डेनिया, यहां भी गार्डेनिया। वहां भी ओमेक्स, डीएलएफ, यहां भी ओमेक्स, डीएलएफ। शहर अपने समाजों के संयोजन से बनता है, इमारतों के रंग-रोगन से नहीं


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