वे गुमनाम हैं। हालांकि लगभग हर दंगे-हंगामे में उनसे मुलाकात हो जाती है।

25/03/2004 00:37

वे सांसद थे। हालांकि संसद नहीं गए थे। वे गुमनाम हैं। हालांकि लगभग हर दंगे-हंगामे में उनसे मुलाकात हो जाती है। वे पर्याप्त निर्धन हैं। हालांकि पिछले साल चार ठेके उनके पोते के नाम छूटे। वे मासूम हैं। हालांकि उनके ससुराल वाले गांव के दो लोग डाके के बाद इनकी जमानत पर रिहा हुए। वे कोमल ह्रदय हैं। हालांकि हर साल दो-चार पिस्तौलों के लाइसेंस जारी करवा देते हैं। वे देश को बहुत प्यार करते हैं। हालांकि तीन फरजी पासपोर्ट के मामले परिवार में चल रहे हैं। वे लोकप्रिय हैं। हालांकि लोकप्रियता के सर्टिफिकेट के लिए उन्होंने मतदान बूथ पर कभी भरोसा नहीं किया।

अभी हुआ यों कि वे संसद में हुए हंगामे से हैरान हो गए। झारखंड में कुछ लोग भूख के मारे आत्महत्या का अधिकार मांग रहे थे। उत्तर प्रदेश में किसानों का मुआवजा प्रकरण जोर पकड़े हुए था। राष्ट्रमंडल खेल और बाकी देश की परेशानियां अलग दुखी किए दे रही थीं। लेकिन, संसद में इस बात पर ‘मॉक पार्लियामेंट’ लग गई कि सांसदों की तनख्वाह पांच सौ गुनी क्यों नहीं की जाती? तीन सौ पर मामला पहुंच गया है, फिर भी किसी को संतोष नहीं है, हमारे ‘गुमनाम सांसद’ की हैरानी यह थी कि उन्हें पहली बार पता चला कि पार्लियामेंट में जाने के भी पैसे मिलते हैं। इस तथ्य के उजागर होने के बाद उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक को अपनी गोपनीय डायरी के कुछ पन्ने सौंपे।
इन पन्नों से पता चलता है कि जीवन क्षणभंगुर है। इसलिए हर क्षण भंगार में भी जीवन ढूंढने का प्रयास किया जाना चाहिए। उनकी डायरी के कुछ अंश यहां दिए जा रहे हैं ताकि सभी सांसदों का कल्याण हो-

सोमवार दोपहार दो बजे
आज मैंने थानेदार को बुलाकार डांटा कि हे मूर्ख, तूने उस कुत्ते के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज क्यों की जो एक टीचर को काटकर भागा था? अब कुत्तों का नेतृत्व करते हुए सभा करने के दिन आ गए हैं। मैं टीचर का ट्रांस्फर करवाने के पैसे कटवा चुका, अब कुत्ते उसे खर्च करवा देंगे।

मंगलवार रात दो बजे
चारों कारें लाइन से लगा दीं। पहली में बैठा, दूसरी बदली, तीसरी पर हाथ फेरा और चौथी से समारोह स्थल पर उतरा। गली में जगह नहीं थी। एक भी कार अपने नाम नहीं है। गली का नाम अपने चाचा के नाम पर रखा जा रहा है।

शुक्रवार सुबह पांच बजे
टेंडर खुले। खुले हुए ही मिले थे। छुटकू की अम्मा के मौसा की बेटी का नाम खुला। लड़की ‘लच्छमी’ पैदा हुई है। पैदा होते ही, टेंडर लाई। ईश्वर सबको ऐसी दे। कौन कहता है हम कन्या जन्म के खिलाफ हैं? शिव! शिव!!

रविवार शाम छः बजे
गीत सुना। मधुपान किया। नृत्य देखा। उत्तम! एक भक्त सरकार से सवाल पूछने के बीस लाख चढ़ा गया। यह सेवा का काम है। पूछकर रहेंगे, वचन नहीं तोड़ते।

सोमवार नींद में
घोटाले की खबर छपी है। कम से कम पंद्रह दिन कीर्तन चलेगा। हमें
सोने दो।
और अंत में
ईश्वर पर जरूर भरोसा रखो क्योंकि कई सवाल और बाकी हैं जिनके जवाब गूगल के पास नहीं हैं।

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