मकान की ऊंचाई में रखें वास्तु का ख्याल ...., बेहद कोमल स्त्रियों के लिए अच्छा है रक्तमणि

 मकान की ऊंचाई में रखें वास्तु का ख्याल ....,    बेहद कोमल स्त्रियों के लिए अच्छा है रक्तमणि

 वा स्तु के अनुसार अगर भवन का निर्माण कार्य संपन्न कराएं तो आगे की परेशानियों से बचा जा सकता है।

चहारदीवारीमकान में चहारदीवारी का निर्माण करते समय हमेशा ध्यान रखें कि दक्षिण-पश्चिम दिशा की चहारदीवारी उत्तर व पूर्व दिशा की अपेक्षा मोटी व ऊंची रखें।

निर्माण कार्य चरणयदि मकान में निर्माण कार्य चरणों में संपन्न कराने की योजना हैतो वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार ही संपन्न कराएं। वास्तु के अनुसार सर्वप्रथम पश्चिम या दक्षिण दिशा में निर्माण कार्य करवाएं।

मकान की ऊंचाईवास्तु के अनुसार किसी मकान की ऊंचाई कितनी होनी चाहिए,इसका पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। ऊंचाई का हिसाब निकालने के लिए मकान की चौड़ाई के 16वें भाग में चार हाथ, 96 अंगुल जोड़कर जितना योग होउसके बराबर ऊंचाई होनी चाहिए। यदि बहुमंजिली मकान की योजना हो तो पहली ऊंचाई में से 12वां भाग कम करके दूसरी मंजिल की ऊंचाई रखें। यही क्रम तीसरी व क्रमशचौथी मंजिल के लिए भी रखें। तीसरी मंजिल के लिए दूसरी मंजिल से 12वां मान कम करें। प्रत्येक मंजिल के लिए यह सामान्य क्रम ऊंचाई के लिए है। यदि इस क्रम से 4, 312 , 3हाथ जोड़ देंतो यह ऊंचाई उत्तम मध्यमकनिष्ठ तीन प्रकार की होगी। यदि इस क्रम में भी क्रमश: 4 हाथ में 20, 18, 16, अंगुल तथा 312 और हाथ में 27, 21, 15अंगुल और जोड़ेंतो उत्तममध्यम और कनिष्ठ ऊंचाई के तीन-तीन भेद और हो जाएंगे। इस प्रकार कुल 12 भेद होंगे। इनमें 8वां व 10वां भेद समान होने से 11 भेद ही माने जाएंगे। भवन में ऊंचाई का हिसाब इस तरीके से ही रखना शुभ होता है।

अपनी रसोई में भी रखें वास्तु का ख्याल

भोजन पकाते समय गृहिणी का मुख सदा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। अखण्ड ऊर्जा के प्रतीक सूर्य देवता के उदय होने की दिशा पूर्व में मुख करके भोजन पकाने से शरीर में चुस्ती-स्फूर्ति का अनुभव होता है।
रसोई से ही आपका स्वास्थ्य अच्छा रह सकता है और एक स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन में अच्छा निर्णय ले सकता है। कहा भी जाता है कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार रसोई में थोडा-बहुत परिवर्तन करने से आप एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर सकते हैं-
रसोई की रूप रचना व बनावट में ज्यादा धातु का प्रयोग न करके लकड़ी व पत्थर का प्रयोग करें क्योंकि ये दोनों ही ऊर्जा के कुचालक हैं और यह तो वैज्ञानिक सत्य है कि किसी भी क्षेत्र में हमारे आस-पास कन्डक्टिविटी जितनी कम हो उतना अच्छा है। कन्डक्शन यानि सुचालकता विद्युत चुंबकत्व व विद्युत-स्थैतिक तरंगो का वाहक है एवं लम्बे समय तक ऐसे उर्जा क्षेत्र में रहना गृहिणियों का स्वास्थ्य खराब कर सकता है। रसोई घर में ज्यादा से ज्यादा हल्के रंगो का प्रयोग करें। इससे स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पडता है।
रसोई की स्लैब पर काला पत्थर न लगाएं क्योंकि हाई कार्बनिक मैटर एवं शनि का प्रतीक काला रंग भोजन से कोई संबंध नहीं रखता है। यहां पर स्लैब का पत्थर सफेद, हरा, लाल, पीला या किसी भी प्रकार के हल्के रंग का होना चाहिए। काले पत्थर पर चीटियों, गदंगी, हल्दी के दाग या ऐसी ही गदंगी आसानी से दिखाई नहीं पड़तीं। भोजन पकाते समय गृहिणी का मुख सदा पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। अखण्ड ऊर्जा के प्रतीक सूर्य देवता के उदय होने की दिशा पूर्व में मुख करके भोजन पकाने से शरीर में चुस्ती-स्फूर्ति का अनुभव होता है। सूर्य ऊर्जा का द्योतक है। साथ ही भारत में ज्यादातर समय पश्चिमी पवनें चलती हैं अत: रसोई का धुंआ भी खाना पकाने वाले व्यक्ति के शरीर को बिना छुए पूर्व दिशा की खिड़की से आसानी से बाहर निकल जाएगा। रसोई की स्लैब में पानी का सिंक यानि बर्तनो को धोने का स्थान सदा स्लैब की उतर की दिशा में एलशेप के बाद होना चाहिए अन्यथा अग्नि तत्व एवं जल तत्व दोनों ही एक स्तर पर इकट्ठे होने से परस्पर शत्रुता भाव रखेंगे व घर में परस्पर प्रेम की जगह कलह का वातावरण रहेगा, ऐसा वास्तुशास्त्र में बताया गया है। 
रसोई में आटा, दाल, आदि जैसा भारी सामान सदा पश्चिम या दक्षिण दिशा में बने शेल्फ, स्लैब या अलमारियो में रखें जबकि हल्का सामान चीनी, चाय की पत्ती, नाश्ते, फॉयल जैसी हल्की चीजों को पूर्व या उत्तर सहित किसी भी दिशा की दीवार पर बने शेल्फ में रखा जा सकता है। रसोई में वाटर प्योरीफायर व फलों तथा सब्जियों आदि को धोने के लिए नल या सिंक की व्यवस्था भी एलशेप में रसोई के उत्तरी भाग में करनी चाहिए।

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