क्‍या है कालसर्प योग?

 क्‍या है कालसर्प योग?

प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में सर्प योग बताया गया है। इस योग का अर्थ है कि कुण्‍डली में सात ग्रह राहू और केतु के एक ओर आ गए हैं। फर्ज कीजिए मेष में राहू है और तुला में केतु इसके साथ सारे ग्रह मेष से तुला या तुला से मेष के बीच हों। इसे सर्प योग कहा जाएगा। ऐसा माना गया है कि राहू सरीसृप है और इसके सिर से पूंछ के बीच सारे ग्रह हैं। बाद में जोधपुर के एक ज्‍योतिषी ने इस योग को कालसर्प बना दिया। यानि समय पर सांप कुण्‍डली मारकर बैठा हुआ। इन लोगों को उपचार नासिक के महाकाल मंदिर में शुरू किया गया और सफलता मिलने के कसीदे गढ़े गए। अति तो तब हुई जब जोधपुर से नासिक तक बाकायदा बस तक चलने लगी। बाद में देश के अन्‍य ज्‍योतिषियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोए। सर्प से कालसर्प बना और कालसर्प से अब विषधकर कालसर्प, नागराज कालसर्प, विपरीत कालसर्प और राजयोग कालसर्प तक बनने लगे हैं। इससे जातकों को इस तरह शापित कर दिया जाता है कि संबंधित व्‍यक्ति के जुकाम भी हो जाए तो लगता है कालसर्प का दोष आड़े आ रहा है

भले ही सुनने में अजीब लगे, लेकिन एक बात पहले स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि ऐसा कोई योग होता ही नहीं है

ज्‍योतिष की किसी भी शाखा में कभी भी कालसर्प जैसा योग नहीं बताया गया है। पिछले दो-तीन दशक में इस योग का जन्‍म हुआ और इसका असर इतना अधिक व्‍यापक बताया गया कि यह तेजी से सफल हुआ। आज भारत के किसी भी कोने में चले जाइए, पुराना हो या नया ज्‍योतिषी, प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष का पक्षधर हो या पश्चिमी हर कोई कालसर्प योग को नकारने में असहज महसूस

करेगा

कुण्डली में राहु और केतु की उपस्थिति के अनुसार व्यक्ति को कालसर्प योग (Kalsarp Yoga) लगता है. कालसर्प योग को अत्यंत अशुभ योग माना गया है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है उसका पतन होता है.यह इस योग का एक पक्ष है

जबकि दूसरा पक्ष यह भी है कि यह योग व्यक्ति को अपने क्षेत्र में सर्वक्षेष्ठ बनता है।



कालसर्प योग (Kalsarp Yoga) का प्राचीन ज्योतिषीय ग्रंथों में विशेष जिक्र नहीं आया है.तकरीबन सौ वर्ष पूर्व ज्योर्तिविदों ने इस योग को ढूंढ़ा.इस योग को हर प्रकार से पीड़ादायक और कष्टकारी बताया गया.आज बहुत से ज्योतिषी इस योग के दुष्प्रभाव का भय दिखाकर लोगों से काफी धन खर्च कराते हैं.ग्रहों की पीड़ा से बचने के लिए लोग खुशी खुशी धन खर्च भी करते हैं.परंतु सच्चाई यह है कि जैसे शनि महाराज सदा पीड़ा दायक नहीं होते उसी प्रकार राहु और केतु द्वारा निर्मित कालसर्प योग हमेंशा अशुभ फल ही नहीं देते.


अगर आपकी कुण्डली में कालसर्प योग (Kalsarp Yoga) है और इसके कारण आप भयभीत हैं तो इस भय को मन से निकाल दीजिए.कालसर्प योग से भयाक्रात होने की आवश्यक्ता नहीं है क्योंकि ऐसे कई उदाहरण हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि इस योग ने व्यक्तियों को सफलता की ऊँचाईयों पर पहुंचाया है.कालसर्प योग से ग्रसित होने के बावजूद बुलंदियों पर पहुंचने वाले कई जाने माने नाम हैं जैसे धीरू भाई अम्बानी, सचिन तेंदुलकर, ऋषिकेश मुखर्जी, पं. जवाहरलाल नेहरू, लता मंगेशकर आदि.
ज्योतिषशास्त्र कहता है कि राहु और केतु छाया ग्रह हैं जो सदैव एक दूसरे से सातवें भाव में होते हैं.जब सभी ग्रह क्रमवार से इन दोनों ग्रहों के बीच आ जाते हैं तब यह योग बनता है. राहु केतु शनि के समान क्रूर ग्रह माने जाते हैं और शनि के समान विचार रखने वाले होते हैं.राहु जिनकी कुण्डली में अनुकूल फल देने वाला होता है उन्हें कालसर्प योग में महान उपलब्धियां हासिल होती है.जैसे शनि की साढ़े साती व्यक्ति से परिश्रम करवाता है एवं उसके अंदर की कमियों को दूर करने की प्रेरणा देता है इसी प्रकार कालसर्प व्यक्ति को जुझारू, संघर्षशील और साहसी बनाता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करता है और निरन्तर आगे बढ़ते जाते हैं.


कालसर्प योग में स्वराशि एवं उच्च राशि में स्थित गुरू, उच्च राशि का राहु, गजकेशरी योग, चतुर्थ केन्द्र विशेष लाभ प्रदान करने वाले होते है.अगर सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो कालसर्प योग वाले व्यक्ति असाधारण प्रतिभा एवं व्यक्तित्व के धनी होते हैं.हो सकता है कि आपकी कुण्डली में मौजूद कालसर्प योग आपको भी महान हस्तियों के समान ऊँचाईयों पर ले जाये अत: निराशा और असफलता का भय मन से निकालकर सतत कोशिश करते रहें आपको कामयाबी जरूरी मिलेगी.इस योग में वही लोग पीछे रह जाते हैं जो निराशा और अकर्मण्य होते हैं परिश्रमी और लगनशील व्यक्तियों के लिए कलसर्प योग राजयोग देने वाला होता है.


कालसर्प योग (Kalsarp Yoga) में त्रिक भाव एवं द्वितीय और अष्टम में राहु की उपस्थिति होने पर व्यक्ति को विशेष परेशानियों का सामना करना होता है परंतु

ज्योतिषीय उपचार से इन्हें अनुकूल बनाया जा सकता है

 

 

 ज्योतिष शास्त्र में राहु और केतु को पाप ग्रह माना गया है। कालसर्प योग में यह ग्रह विपरीत राशियों में होते हैं, जिससे यह ग्रह फल पर बुरा असर डालते हैं। राहू का असर शनि के समान और केतु का मंगल के समान माना जाता है। इसलिए काल सर्प दोष शांति के लिए कुछ सरल मंत्रों का जप भी प्रभावी होता है। इन मंत्रों का कम से कम 5 बार सुबह या विश्राम के समय जप करते रहें। यह मंत्र है -

शिव उपासना मंत्र

ऊँ नम: शिवाय।

कालसर्प दोष के बुरे प्रभाव जीवन में तरह-तरह से बाधा पैदा कर सकते हैं। पूरी तरह से मेहनत करने पर भी अंतिम समय में सफलता से दूर हो सकते हैं। कालसर्प दोष शांति के लिए बड़े धार्मिक उपाय के लिए समय या धन का अभाव होने पर यहां कालसर्प दोष शांति के कुछ ऐसे छोटे किंतु असरदार उपाय बताए जा रहे हैं, जो निश्चित रुप से आपके जीवन पर होने वाले बुरे असर को रोकते हैं - 

- श्री हनुमान चालीसा का पाठ नियमित रुप से करें। यह जीवन में हर बाधा दूर करने का सटीक उपाय है। 

- हर सोमवार खासतौर पर सावन माह के सोमवार को शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें।

- नाग पंचमी के दिन शिव की पूजा कर चांदी के नाग का जोड़ा चढ़ाएं और एक जोड़ा चांदी का सर्प बहते जल में बहाएं।

- शनिवार शाम को सिर से 7 बार नारियल उतारकर बहते जल में बहाएं। 

- अपने भार के बराबर कोयला तीन भाग में बांट लें और किसी भी तीन शनिवार को लगातार जल में छोड़ें। 

- कालसर्प योग हो और जीवन में लगातार गंभीर बाधा आ रही हो तब किसी विद्वान ब्राह्मण से राहु और केतु के मंत्रों का जप कराया जाना चाहिए और उनकी सलाह से राहु और केतु की वस्तुओं का दान या तुलादान करना चाहिए।

 

ज्योतिष विज्ञान अनुसार छायाग्रहों यानि दिखाई न देने वाले राहू और केतु के कारण कुण्डली में बने कालसर्प योग के शुभ होने पर जीवन में सुख मिलता है, किंतु इसके बुरे असर से व्यक्ति जीवन भर कठिनाईयों से जूझता रहता है। दूसरी तरह कालसर्प दोष के शमन के लिए बताए गए समय और धन खर्च करने वाले उपाय हर व्यक्ति वहन नहीं कर सकता। किंतु सनातन धर्म में नित्य देव आराधना संकट मुक्ति की सबसे उचित राह मानी जाती है। इसलिए यहां बताया जा रहा है कालसर्प दोष से बचाव के लिए ही किन-किन देवताओं की उपासना संकटमोचक होती है।

 

- कालसर्प योग के दोष से मुक्ति के लिए नागों के देवता भगवान शिव की भक्ति और आराधना सबसे श्रेष्ठ उपाय है। 

- पुराणों में बताया गया है कि भगवान श्री कृष्ण ने कालिय नाग का मद चूर किया था। इसलिए इस दोष शांति के लिए भगवान श्री कृष्ण की आराधना भी श्रेष्ठ है।

- प्रथम पूज्य शिव पुत्र श्री गणेश को विघ्रहर्ता कहा जाता है। इसलिए कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए गणेश पूजा भी करनी चाहिए। 

- शिव अवतार श्री हनुमान जी राहु और केतु के कष्टों से छुटकारा दिलाते हैं। इसलिए हनुमान उपासना भी बहुत शुभदायी है।

- शिव के ही अंश बटुक भैरव की आराधना से भी इस दोष से बचाव हो सकता है। 

- कालसर्प योग बनाने वाले राहु और केतु के मंत्र का जप भी करना चाहिए

 

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