प्रश्न की शुरुआत

प्रश्न की शुरुआत

 

पूंजीवाद का उद्भव - इलेन मिक्सिन्स वुड

 
प्रस्तावना
बीसवीं सदी के आठवें दशक के अंतिम वर्षों में और नौवें दशक के दौरान कम्युनिज्म ढेर हो गया। इससे ऐसा लगा कि लंबे समय से चलते आए उन अनेक लोगों के विश्वासों की पुष्टि हो गई कि मानवता की स्वाभाविक स्थिति पूंजीवाद है और प्रकृति के नियमों तथा मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों के अनुरूप भी यही है। साथ-साथ उनका यह भी मानना था कि इन प्राकृतिक नियमों तथा प्रवृत्तियों से किसी भी प्रकार के विचलन से दुखदाई परिणाम ही निकलेंगे। 
लेकिन आज साम्यवाद के ढह जाने के बाद सामने आए पूंजीवादी विजयवाद पर प्रश्नचिह्न लगाने के अनेक कारण हैं। जिस समय मैं यह प्रस्तावना लिख रही हूं मेरा सुबह का अखबार 'आधुनिक पूंजीवादी युग का कदाचित सबसे गंभीर ठहराव' के बारे में सूचना और चेतावनी देता है कि दुनिया में उसी स्तर की या विस्तार में उससे भी बड़ी मंदी आ सकती है जितनी कि पिछली सदी के तीसरे दशक में आई थी। दुनिया अब भी एशियाई संकट की लपेट में है और इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके अंत से हम अब भी बहूत दूर हैं और विश्व अर्थव्यवस्था पर इसका पूरा-पूरा प्रभाव तो आने वाले समय में ही दिखाई पड़ेगा। सोवियत संघ का अंत पूंजीवादी विजय की सबसे अहंकारी उपलब्धि रही है। इससे रूसी अर्थव्यवस्था तो लगभग पूरी तरह चौपट हो ही चुकी है पर इसके तरह-तरह के प्रभाव विकसित पूंजीवाद के संपूर्ण जगत पर भी पड़े हैं। पश्चिमी देशों के समाचार जगत के कुछ संपादकीयों का मत है कि इनमें से कुछ प्रभाव इतने नुकसानदेह हैं जितने पूंजीवाद पर सोवियत संघ ने कभी नहीं डाले थे। 
अतीत में पूंजीवाद बार-बार आने वाले संकटों से सदा उबरता रहा है लेकिन यह कभी भी नए और अधिक बुरे संकट की आधारशिला स्थापित हुए बगैर नहीं हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह व्यवस्था भग्नावशेषों से फिर उभर आएगी। लेकिन नुकसान को सीमित करने या उसकी भरपाई करने के लिए चाहे जो उपाय किए जाएं यह निश्चित है कि इसके इलाज से भी करोड़ों लोगों को मुसीबतें उठानी पडेंग़ी जितने लोगों को बीमारियों से उठानी पड़ी हैं। 
पूंजीवादी व्यवस्था का उत्तरोत्तर स्पष्ट होती जा रही कमजोरियां और इसके अंतर्विरोध अंतत: इसके कुछ अधिक अंध समर्थकों तक को यह विश्वास दिला देंगे कि इसके विकल्प की तलाश करना आवश्यक है। लेकिन यह विश्वास खास तौर पर पश्चिमी संस्कृति में बहुत गहराई से पैठा है कि इसका न कोई विकल्प है और न ही हो सकता है। इस विश्वास का समर्थन न केवल पूंजीवादी विचारधारा की अधिक नंगी अभिव्यक्तियों द्वारा बल्कि हमारे इतिहास की कुछ सर्वाधिक संजोई और निर्विवाद मान्यताओं द्वारा भी किया जाता है। मानो कि पूंजीवाद ही इतिहास के हर आंदोलन की नियति रहा है और, इससे भी अधिक प्रारंभ से ही इतिहास का संचालन पूंजीवादी 'गति के नियमों' से होता रहा है। 

प्रश्न की शुरुआत 
पूंजीवाद वह व्यवस्था है जिसमें जीवन की सबसे मूल आवश्यकताओं तक हर चीज और सेवा का उत्पादन लाभदायी विनिमय के लिए किया जाता है और जिसमें मानव श्रम शक्ति तक बाजार में बेचने का एक माल होती है, और जहां चूंकि आर्थिक गतिविधियों में संलग्न तमाम अभिनेता बाजार पर निर्भर होते हैं अत: प्रतिस्पर्धा और अधिकतम मुनाफा कमाने की आवश्यकताएं जीवन के आधारभूत नियम बन जाती हैं। इन नियमों के कारण यह वह व्यवस्था है जिसका संचालन उत्पादन की शक्तियों का अपूर्व विकास करने तथा तकनीकी उपायों से श्रम की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। सर्वोपरि तो यह वह व्यवस्था है जिसमें समाज का ज्यादातर काम संपत्तिहीन श्रमिकों द्वारा किया जाता है। ये श्रमिक जीवन के साधन प्राप्त करने के लिए अपनी श्रम शक्ति को वेतन के बदले बेचने को विवश होते हैं। समाज की आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति करने की प्रक्रिया में श्रमिक उनके लिए मुनाफे भी पैदा करते हैं जो उनकी श्रम शक्ति को खरीदते हैं। वास्तविकता यह है कि चीजों और सेवाओं का उत्पादन पूंजी और पूंजीवादी मुनाफे के अधीन है। या यों कहें कि पूंजीवादी व्यवस्था का मूल लक्ष्य पूंजी का उत्पादन और उसका स्वयं विस्तार है। 
मानव मात्र की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने की यह विशिष्ट पध्दति भौतिक जीवन और सामाजिक पुनरुत्पादन को संगठित करने की तमाम पूर्ववर्ती पध्दतियों से बहुत भिन्न है और यह धरती पर मानव जीवन के संपूर्ण अस्तित्व के एक बहुत छोटे से हिस्से ही अस्तित्व में है। जो लोग बलपूर्वक यह कहते हैं कि इस व्यवस्था की जड़ें मानव प्रकृति में स्थित हैं वे भी यह दावा नहीं करते कि इसका अस्तित्व प्रारंभिक आधुनिक काल से पहले (और वह भी केवल पश्चिमी यूरोप में) भी था। वे इसके संकेत पहले के कालों में देख सकते हैं या इसकी शुरुआतों को मध्य कालों में पतनशील सामंतवाद पर मंडराते खतरे में तलाश कर सकते हैं हालांकि उस समय तक यह सामंती प्रतिबंधों से नियंत्रित था, अथवा यह कह सकते हैं कि इसका प्रारंभ व्यापार के विस्तार या खोजी समुद्र यात्राओं, खास तौर पर पंद्रहवीं सदी के अंत में कोलंबस के समुद्री अभियान के साथ हुआ। लेकिन ईमानदारी के साथ यह बात कुछ ही लोग कहेंगे कि इसका अस्तित्व सोलहवीं या सत्रहवीं सदी से पहले भी था, और कुछ तो कहेंगे कि यह अठारहवीं सदी में या यहां तक कि अपने औद्योगिक रूप में परिपक्व होने के बाद उन्नीसवीं सदी में तब अस्तित्व में आया था। फिर भी यह व्यवस्था अस्तित्व में कैसे आई इसके ऐतिहासिक कारणों को विशिष्ट प्रकार से सदा उपस्थिति प्रवृत्तियों की स्वाभाविक परिणति के रूप में प्रस्तुत किया गया। चूंकि इतिहासकारों ने प्रारंभ पूंजीवाद के उदय की व्याख्या करने के साथ किया अत: ऐसी कोई व्याख्या शायद ही मिल पाए जिसने शुरुआत ही उस चीज से न की हो जिसकी व्याख्या की जानी थी। लगभग बिना किसी अपवाद के पूंजीवाद की उत्पत्ति के वृत्तांत मूलतया एक ही धुरी पर घूमते रहे हैं। इसके पैदा होने की व्याख्या करने के लिए वे इसके अस्तित्व को पहले से मानते रहे हैं। अधिकतम मुनाफे की ओर पूंजीवाद के विशिष्ट अभियान की व्याख्या करने के लिए उन्होंने यह कल्पना कर ली थी कि अधिकतम मुनाफे कमाने की चेतना पहले से ही उपस्थित थी। और तकनीकी उपायों से श्रम उत्पादकता को बढ़ाने के पूंजीवादी रुझान की व्याख्या करने के लिए उन्होंने पहले से मान लिया था कि श्रम की उत्पादकता में प्रौद्योगिकी सुधार की दिशा में प्रगति लगातार होती रही है जो लगभग प्राकृतिक है। चीजों को पहले से मान कर चलने वाली इन व्याख्याओं का जन्म क्लासिकीय राजनीतिक अर्थशास्त्र और प्रगति की प्रबोधक अवधारणाओं से हुआ। इन दोनों ने मिलकर ऐतिहासिक विकास का जो वर्णन किया उसमें पूंजीवाद की उत्पत्ति और उसके विकास से उसकी परिपक्वता तक के बीज मानवीय चेतना की सबसे प्राचीन अभिव्यक्ति के तौर पर पहले से मौजूद थे। वे उन प्रौद्योगिक विकास में भी थे जिसका प्रारंभ आदिमानव द्वारा एक उपकरण गढ़ने के साथ हुआ था और वे आदान-प्रदान की उन गतिविधियों में भी मौजूद थे जिनको मानव मात्र अनादि काल से करता रहा है। वे स्वीकार करते हैं कि 'वाणिज्यिक समाज' या पूंजीवाद की दिशा में इतिहास की यह यात्रा लंबी और कठिन थी और इसके रास्ते में अनेक अवरोध थे। फिर भी इसकी प्रगति स्वाभाविक और अपरिहार्य थी। 'पूंजीवाद के उदय' को बताने के लिए यह कहना ही काफी है कि इसके आगे बढ़ने के दौरान कितने अवरोधों को कैसे हटाया गया है, जो कभी-कभी क्रमश: हुआ है और कभी-कभी क्रांतिकारी हिंसा के साथ अचानक। 
पूंजीवाद और इसकी उत्पत्ति के जो वर्णन किए गए हैं उनमें से अधिकांश में तो वास्तव में इसकी उत्पत्ति की चर्चा ही नहीं है। पूंजीवाद कहीं न कहीं हमेशा विद्यमान रहा प्रतीत होता है और जरूरत केवल इसे इसकी बेड़ियों से मुक्त करने की रही है जैसे कि सामंतवाद से, ताकि यह बढ़ सके और परिपक्व हो सके। ये बेड़ियां विशेष तौर पर राजनीतिक रही हैं अर्थात स्वामियों की परजीवी शक्तियां या निरकुंशतावादी राज्य के प्रतिबंध। कभी-कभी वे सांस्कृतिक और वैचारिक थीं शायद दोषपूर्ण धर्म के कारण। इन बंधनों ने आर्थिक अभिनेताओं की स्वतंत्र गतिविधियों को सीमित और आर्थिक तर्कणा की मुक्त अभिव्यक्ति को अवरुध्द कर दिया था। इन प्रतिपादनों में 'आर्थिक' का अर्थ बाजारों में आदान-प्रदान है, और यहां हम इस पूर्वानुमान को पकड़ सकते हैं कि पूंजीवाद के बीज विनिमय के सबसे सरल कार्यों में, व्यापार या बाजार की गतिविधियों में मौजूद हैं। यह पूर्वानुमान विशिष्ट तौर पर उन दूसरे पूर्व मान्यताओं से जुड़ा है कि इतिहास प्रौद्योगिक विकास की लगभग प्राकृतिक प्रक्रिया रही है। अत: जब और जहां फैलते हुए बाजार और प्रौद्योगिक विकास एक उचित स्तर तक पहुंच जाते हैं तो किसी न किसी प्रकार से पूंजीवाद कमोबेश स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाता है। अनेक मार्क्सवादी व्याख्याएं मूलतया एक सी हैं जिनके साथ बेड़ियों को तोड़ने में मदद करने को बुर्जुआ क्रांतियां जुड़ जाती हैं। 
इन व्याख्याओं का उद्देश्य गैर-पूंजीवादी और पूंजीवादी समाजों के बीच निरंतरता पर जोर देना और पूंजीवाद की विशिष्टता से इनकार करना अथवा उसे छिपाना है। विनिमय या लेन-देन कमोबेश सदा से होता रहा है और ऐसा लगता है कि पूंजीवादी बाजार बस उसी का बढ़ा हुआ रूप है। इस प्रकार के तर्क के अनुसार उद्योगीकरण मानव जाति के सबसे मूल रुझानों का अनिवार्य परिणाम है। कारण यह है कि उत्पादन की शक्तियों में लगातार आमूल परिवर्तन करना पूंजीवाद की विशिष्टता और अपूर्व आवश्यकता है और ये सर्वजनीन इतिहास पार की एक विस्तार और त्वरण मात्र हैं। और इसलिए पूंजीवाद की वंश परंपरा स्वाभाविक तौर पर बेबीलोन या रोम के व्यवसायी से शुरू होकर मध्यकालीन नगरवासी से गुजरती हुई प्रारंभिक आधुनिक बुर्जुआ और अंतत: औद्योगिक पूंजीपति तक पहुंचती है। 
इस वृत्तांत के कुछ मार्क्सवादी रूपांतरों में यही तर्क है हालांकि, अधिक हाल के रूपांतरों में वर्णन अधिकतर शहरों से गांवों की ओर मुड़ जाता है और व्यापारियों का स्थान गांवों के माल उत्पादक, छोटे या 'मंझोले' किसान ले लेते हैं जो साफ तौर पर पूर्ण रूप से विकसित पूंजीपतियों के रूप में फूलने फलने की राह देख रहे होते हैं। इस प्रकार के वृत्तांत में सामंतवाद के बंधनों से मुक्त हुआ छोटा माल उत्पादन कमोबेश स्वाभाविक तौर पर पूंजीवाद में विकास कर जाता है, और मौका मिलते ही छोटा माल उत्पादन पूंजीवादी राजमार्ग पर निकल पड़ता है। 
इतिहास के इन परंपरागत वृत्तांतों में मानव प्रकृति के बारे में और यदि अवसर मिलता है तो मनुष्यों का व्यवहार क्या होगा के संबंध में कुछ स्पष्ट अथवा अस्पष्ट कल्पनाएं हैं। कहानी यह है कि लेन-देन की गतिविधियों के द्वारा वे हमेशा अधिकतम मुनाफे कमाने के अवसर का लाभ उठाएंगे, और अपने प्राकृतिक रुझान को साकार करने के लिए वे श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से हमेशा श्रम के संगठन तथा उपकरणों को सुधारने के मार्ग ढूढ़ लेंगे। 
अवसर या अनिवार्यता?
इस प्रकार क्लासिकीय माडल के अनुसार जहां कहीं, जब कभी संभव हो अवसर का लाभ उठाना चाहिए। पूंजीवादी व्यवस्था की परंपरागत समझ के लिए अवसर की यह अवधारणा हमारी आज की रोजमर्रा की भाषा में भी, निर्णायक महत्व रखती है। जरा विचार करिए कि पूंजीवाद के हृदय बाजार में बसे इस शब्द को सामान्य तौर पर कैसे इस्तेमाल किया जाता है। शब्दकोश में 'बाजार' की लगभग प्रत्येक परिभाषा किसी अवसर का अर्थ रखती है। अर्थात एक ठोस स्थल या अवसर के रूप में बाजार वह स्थान है जहां बेचने और खरीदने के मौके मौजूद होते हैं। सारांश यह है कि बाजार विक्रय की संभावना है। चीजों को 'बाजार मिलता है' और हम कहते हैं कि किसी सेवा या माल के लिए बाजार तब है जब इसके लिए मांग है जिसका अर्थ है कि इसे बेचा जा सकता है और बेचा जाएगा। जो बेचना चाहते हैं उनके लिए बाजार 'खुले' हैं। बाजार 'खरीदने और बेचने से जुड़ी परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करता है (दि कानसाइज आक्सफोर्ड डिक्शनरी)। बाजार का आशय प्रस्तुत करना और चुनाव करना है। तब फिर बाजार की ताकतें क्या हैं? क्या शक्ति का अर्थ दबाव नहीं? पूंजीवादी विचारधारा में बाजार का आशय बाध्यता से नहीं स्वतंत्रता से है। साथ ही इस स्वतंत्रता को कुछ कार्यप्रणालियों द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। और यह एक ऐसी तर्कसंगत अर्थव्यवस्था को सुनिश्चित करती है जिसमें जिन सेवाओं और मालों को लोग स्वतंत्र रूप से चुनेंगे, उनको प्रस्तुत करती हुई आपूर्ति मांग से मेल खाती है। ये कार्यप्रणालियां बाजार की अवैयक्तिक शक्तियां हैं और अगर वे किसी तरह से बाध्य करने वाली हैं तो केवल इन अर्थों में कि वे आर्थिक अभिनेताओं को 'तर्कसंगत ढंग से' व्यवहार करने को विवश करती हैं ताकि चुनाव और अवसर का अधिकतम उपयोग हो सके। इसका अर्थ है कि पूंजीवाद 'बाजारी समाज का' चरम अवसर और चुनाव की सर्वश्रेष्ठ परिस्थिति है। ज्यादा वस्तुएं और सेवाएं प्रस्तुत हैं, ज्यादा लोग इनको बेचने और मुनाफा कमाने के लिए स्वतंत्र हैं और ज्यादा लोग स्वतंत्र हैं उनके बीच से चुनने तथा उनको खरीदने के लिए। तब फिर इस विचार में दोष क्या है? समाजवादी संभवतया यह कहेगा कि प्रमुख तत्व जो इसमें नहीं हैं वे हैं श्रम शक्ति का माल बनना और वर्ग शोषण। चलिए मान लेते हैं। लेकिन बाजार की समाजवादी व्याख्या में भी हमेशा यह स्पष्ट नहीं होता कि पूंजीवादी बाजार की सबसे अलग और प्रधान विशिष्टता अवसर या चुनाव नहीं बल्कि उनके विपरीत बाध्यता है। यह दो अर्थों में है। एक कि पूंजीवाद में भौतिक जीवन और सामाजिक पुनरुत्पादन सार्वदेशिक तौर पर बाजार की मध्यस्थता होती है। इसके कारण जीवन के साधनों को प्राप्त करने के लिए तमाम लोग किसी न किसी रूप में बाजारी संबंध बनाते हैं, और दूसरे पूंजीवादी बाजार के आदेश और प्रतिस्पर्धा, संचयन, अधिकतम मुनाफे और श्रम उत्पादकता में वृध्दि की इसकी अनिवार्यताएं सारे आर्थिक लेन देन को ही नहीं बल्कि आम तौर पर सारे सामाजिक संबंधों को भी नियंत्रित करती हैं। चूंकि मनुष्यों के बीच के संबंधों में माल विनिमय की प्रक्रिया मध्यस्थ का काम करती है अत: लोगों के बीच के सामाजिक संबंध या वस्तुओं के बीच के संबंध प्रतीत होते हैं जिसे मार्क्स ने अपनी प्रसिध्द सूक्ति में 'माल का जादू' कहा था। 
यहां कुछ पाठक आपत्ति कर सकते हैं कि यह बात तो हर समाजवादी या कम से कम कम्युनिस्ट तो जानता ही है। लेकिन पूंजीवाद के मार्क्सवादी इतिहासों तक में पूंजीवाद की विशिष्टताएं वैसे ही खो जाती हैं जैसे कि पूंजीवादी बाजार के क्रियाकलाप जो अवसर के बजाए अनिवार्यता के रूप में होते हैं। एक विशिष्ट सामाजिक ढांचे के तौर पर पूंजीवाद बाजार तब खो जाता है जब पूर्व पूंजीवादी समाजों से पूंजीवादी समाजों में संक्रमण को न्यूनाधिक स्वाभाविक अवसर पहले से मौजूद सामाजिक ढांचों के आड़े-तिरछे, विस्तारित अथवा परिपक्व, संघटना के रूप में, गुणात्मक के स्थान पर परिमाणात्मक रूपांतरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।
यह छोटी सी पुस्तक पूंजीवाद के उदय और उन ऐतिहासिक तथा सैध्दांतिक विवादों के बारे में है जिसको इसने पैदा किया है। पहले भाग में सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृत्तांतों और उनके चारों ओर की बहसों पर नजर डाली गई है। इसमें हम विशेष तौर पर इसके अनेक विभेदों के साथ पूंजीवादी विकास के सबसे आम, तथाकथित वाणिज्यीकरण माडल पर, और इसको मिलने वाली कुछ मुख्य चुनौतियों पर विचार करेंगे। भाग दो एक वैकल्पिक इतिहास की रूपरेखा बनाता है जिसमें मुझे आशा है कि आम सवाल पैदा करने वाली व्याख्याओं के कुछ सबसे आम फंदे नहीं होंगे। यह रूपरेखा भाग एक में चर्चित पूंजीवाद के उन इतिहासों की हृदय से ऋणी है जिन्होंने इतिहास की कुछ प्रचलित रूढ़ियों पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। सर्वोपरि तो मेरा इरादा पूंजीवाद के प्राकृतीकरण को चुनौती देना और उन विशेष उपायों को रेखांकित करना है जिनमें यह एक ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट सामाजिक ढांचे का और पूर्ववर्ती सामाजिक ढांचों से अलगाव का प्रतिनिधित्व करता है। इस कसरत के उद्देश्य बौध्दिक और राजनीतिक दोनों हैं। पूंजीवाद का प्राकृतीकरण अतीत के बारे में हमारी समझ को सीमित करता है क्योंकि यह पूंजीवाद की विशिष्टता को तथा इसको जन्म देने वाली लंबी और दु:खदायी प्रक्रियाओं को अस्वीकार करता है। साथ ही यह भविष्य के प्रति हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को भी सीमित करता है क्योंकि यदि पूंजीवाद इतिहास की प्राकृतिक पराकाष्ठा है तो इसको पार करने की कल्पना तक नहीं की जा सकती। पूंजीवाद के उदय का प्रश्न रहस्यपूर्ण लग सकता है पर यह हमारी संस्कृति में गहरी जड़ें जमाए धारणाओं के, तथाकथित मुक्त बाजार और मानवता को इसके लाभों से संबंधित व्यापक और खतरनाक भ्रमों के मूल में जाता है। पूंजीवाद के भावी विकल्पों के बारे में विचार करते समय हमसे इसके अतीत के विकल्पों को खोजने की अपेक्षा की जाती है। 
( साभार,    पूंजीवाद का उद्भव ,इलेन मिक्सिन्स वुड ,अनुवादक नरेंद्रकुमार तोमर,ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, बी-7, सरस्वती कामप्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मी नगर, दिल्ली 110 092 )

 

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