राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) से सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय का अलग हो जाना

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) से सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय का अलग हो जाना

एनडीए के शासनकाल में इंडिया शाइनिंग का नारा खूब बुलंद हुआ, लेकिन चमकते भारत की यह तस्वीर भाजपा और उसके सहयोगियों को दोबारा सत्ता में नहींला सकी। बल्कि जनता ने कांग्रेस का साथ देना पसंद किया। यूपीए सरकार में भी ऐसे तत्वों की कमी नहींजो इंडिया शाइनिंग जैसे पूंजीवादी नारों में यकीन रखते हैं और उसी अनुरूप कार्य करते हैं। ऐसे में यूपीए के समक्ष एनडीए का दूसरा संस्करण बनने का खतरा मौजूद था। सोनिया गांधी ने इस खतरे को समझा और आम जनता के लिए जमीनी स्तर की कार्ययोजनाओं को लागू करने और कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ करने को एनएसी का गठन हुआ। अपने गठन से लेकर अब तक एनएसी की पहल का ही नतीजा है कि देश को सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और मनरेगा जैसी योजनाएं मूर्तरूप में प्राप्त हुईं। इन कानूनों को व्यावहारिक रूप से लागू करने और व्यवस्था में व्याप्त भ्रषटाचार के कारण इनका समुचित न लाभ मिलने की शिकायत जनता को हो सकती है

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) से सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय का अलग हो जाना एक नजर में सीधा-सादा मामला लगता है कि 31 मई को उनका कार्यकाल खत्म हो रहा था और उन्होंने एनएसी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर एक कार्यकाल और न देने का अनुरोध किया, जिसे अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया। लेकिन गहराई से सोचा जाए तो यह यूपीए सरकार द्वारा चलाए जा रहे तृणमूल स्तर कार्यक्रमों और योजनाओं के लिए एक बड़ा नुकसान है। एनएसी का गठन 2004 में सोनिया गांधी की पहल पर हुआ था। यूपीए सरकार की मुखिया रहते हुए सोनिया गांधी को एनएसी के गठन की आवश्यकता  पड़ी,

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