व्यापमं का ये ख़ूनी खेल और कहां से शुरू होती है

व्यापमं का ये ख़ूनी खेल और कहां से शुरू होती है

नई दिल्‍ली: कुछ की मौत को हादसा बताया जा रहा है, कुछ की मौत को ख़ुदकुशी बताया जा रहा है, कुछ की मौत को क़त्ल माना जा रहा है, ये कहानी व्यापमं की है जो किसी जानलेवा रोग की तरह हमारे समाज और हमारे तंत्र को जकड़े हुए है। हज़ारों आरोपियों और लाखों प्रभावित लोगों के जाल के बीच क्या है ये व्यापमं का ख़ूनी खेल कहां से शुरू होती है सपनों की ये क़ब्रगाह?

दिल्ली से मध्य प्रदेश के कई छोटे-बड़े शहरों तक- जबलपुर, इंदौर, उज्जैन, झाबुआ- हर जगह व्यापमं की चर्चा है। टेक्‍निकल कॉलेजों में दाखिला हो या नौकरियों का मसला- इसमें इतने तरह का भ्रष्टाचार सामने आ रहा है कि सब हैरान हैं। जिस मामले में राज्यपाल, मंत्री, संतरी, डॉक्टर, शिक्षक सब आरोपी ठहराए जाएं, उसका सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वह कितना बड़ा होगा। इस केस में अब तक हज़ारों लोग आरोपी बनाए जा चुके हैं, सैकड़ों लोग जेल के पीछे हैं और सबसे ख़तरनाक पहलू है कि कई लोगों की जान गई है। ये खूंखार खेल कई तरह से चलता है।

आइए डालते हैं इस खेल के कई पहलुओं पर नज़र...
सबसे पहले एक मासूम लड़की की कहानी- जो अनजाने में व्यापमं के जाल में ऐसी घिरी कि निकल तक नहीं पाई।

इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में एक बेहतर ज़िंदगी का सपना लिए हर साल सैकड़ों छात्र आते हैं। इन्हीं में से एक थी 19 साल की नम्रता दामोर। छोटे से शहर झाबुआ से आई थी बड़े सपने लिए लेकिन एक बार पांव भटके और फिर वो वापस लौट नहीं पाई।

तीन साल पहले, यानी 2012 में रेलवे ट्रैक पर मिली एक लाश, उस लाश की कोई पहचान नहीं थी। अंतिम संस्कार के बाद पता चला, ये नम्रता का शव था। लेकिन तीन साल बाद भी पुलिस ये बताने की हालत में नहीं है कि नम्रता ने ख़ुदकुशी की या उसकी हत्या हुई।

नम्रता का जिस डॉक्टर ने पोस्टमार्टम किया उसने एनडीटीवी को कहा, 'जो रिपोर्ट थी उसमें साफ़ था कि ये हत्या थी ना की खुदकुशी।' उज्जैन के इसी पुलिस स्टेशन में नम्रता के मामले की जांच चल रही है या अटकी पड़ी है। पुलिस साफ-साफ कुछ कहने से बच रही है।

नम्रता की पोस्टमार्टम और डीएनए रिपोर्ट से भी सवाल पैदा हो रहे हैं। डीएनए रिपोर्ट में नम्रता के कपड़ों पर सीमन के सैंपल मिले हैं लेकिन उसके साथ सफ़र कर रहे चार लोगों में से किसी से उनके नमूने मिल नहीं रहे। पोस्टमार्टम के मुताबिक, उसकी मौत की वजह गला दबाया जाना भी हो सकती है। पुलिस बस इतना कहती है कि परिवार चाहे तो नए सिरे से शिकायत दर्ज करा सकता है। जबकि नम्रता के पिता जैसे नाउम्मीद हो चुके हैं। बेटी के इंसाफ़ का ख़याल ज़रूर है। नम्रता के पिता का कहना है, 'पुलिस बहुत दबाब में थी इसलिए कोई नतीजा नहीं पाया।'

सवाल ये है कि नम्रता की मौत की वजह क्या हो सकती है? इसके जवाब में व्यापमं का एक डरावना चेहरा खुलता है। ये दिखता है कि नम्रता शिकार बाद में बनी, पहले वो इस मामले की साझेदार बन गई। व्यापमं मामले को उजागर करने वाले आनंद राय का कहना है, 'इन लोगों द्वारा नम्रता का इस्तेमाल किया गया, पैसे की भी बात थी।'

दरअसल, नम्रता ने 2010 में पीएमटी की परीक्षा पास की थी, लेकिन 2011 में उसका नाम फ़र्ज़ी ढंग से दाख़िला लेने वालों की सूची में चला आया। इस मामले के एक और गिरफ़्तार आरोपी विशाल वर्मा के साथ उसे ख़ूब देखा जाता रहा। विशाल 2009 बैच का पीएमटी का छात्र है। नम्रता का दाखिला ग्वालियर के जीआर मेडिकल कॉलेज में हुआ था, बाद में इंदौर के एमजीएम में उसका तबादला कराया गया।


नम्रता को इस दलदल में घसीटने वाला शख़्स था जगदीश सागर। इंदौर का डॉ. जगदीश सागर जिसे पुलिस ने 2013 में गिरफ़्तार किया। पुलिस के मुताबिक जगदीश सागर व्यापमं घोटाले में बिचौलिए की भूमिका अदा करता रहा। इंदौर में ही

जगदीश सागर ने साइकिल से मर्सिडीज़ तक का सफ़र तय किया। दस साल में एमबीबीएस करने के बाद भिंड इलाक़े में इसने कुछ ही सालों में 25 डॉक्टर बना दिए। नम्रता का दाख़िला भी इसी ने करवाया था। बाद में दोनों साथ काम करने लगे, लेकिन जानकारों के मुताबिक तीन लाख रुपये के लेनदेन पर विवाद हो गया। हालांकि नम्रता का परिवार कहता है, उसका किसी गड़बड़ी में हाथ नहीं है।

इंदौर के इंडेक्स कॉलेज में जगदीश सागर असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाता था। यहीं से वो अपना गोरखधंधा चलाता रहा। अब तक की जांच में ये बात सामने आई है कि...
- यहीं इसके लोग पूरे साल भर उम्मीदवार चुना करते।
- और यहीं सवालों के हल करने वाले चुने जाते।
- उसके बाद जगदीश सागर लिस्ट बनाया करता।
- बाद में ये लिस्ट नितिन महेंद्रा को जाती।
- हर नाम के एक लाख रुपये दिए जाते।
- यानी सौ नाम हुए तो एक करोड़ रुपये।

जगदीश सागर जब गिरफ़्तार हुआ तो उसके पास से 345 उम्मीदवारों की सूची निकली। लेकिन सवाल है, ये सारे लोग बेख़ौफ़ इतने साल काम कैसे करते रहे। जवाब कुछ तस्वीरों में छुपा है। जगदीश सागर बीजेपी के महासचिव और अब बंगाल के प्रभारी बनाए गए कैलाश विजयवर्गीय के क़रीब रहा।

जगदीश सागर अकेला नहीं है। 2008 से 2011 के बीच व्यापमं के कंट्रोलर रहे सुधीर सिंह भदौरिया पर 2011 के प्री पीजी इम्तिहान में गड़बड़ी करने का आरोप है। लेकिन उनकी गिरफ़्तारी अब तक नहीं हुई है। प्री पीजी मामले की जांच

एसटीएफ़ नहीं, बल्कि ग्वालियर की एसआइटी कर रही है।  ग्वालियर के भदौरिया के पीछे एक बड़े नेता का हाथ माना जाता है। ये अलग बात है कि 2008 से 2011 के बीच 333 बच्चे पीएमटी से रेस्टिकेट किए जा चुके हैं।


अब बात ऋचा जौहरी की जो फिलहाल फ़रार है। ऋचा ने 2010 में प्री पीजी में 30वीं रैंक हासिल की, लेकिन 2011 में उसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज हो गया। उसके न्यूरोलॉजिस्ट पिता गिरफ़्तार हैं और उसका दाख़िला कराने वाले योगेशचंद उप्रित भी। पुलिस ने अब ऋचा के ख़िलाफ़ 5000 रुपये का इनाम भी घोषित किया है। पुलिस का कहना है कि उप्रित ने ही सुधीर सिंह भदौरिया की मदद से जौहरी का दाखिला कराया। 74 साल के उप्रित 2003-04 तक व्यापमं के निदेशक रहे और वीआइपी लोगों के बच्चों को दाखिला दिलवाने में अहम भूमिका अदा करते रहे। फिलहाल वो ग्वालियर की जेल में बंद हैं। बीमार हैं, प्रोस्टेट कैंसर के इलाज के लिए दिल्ली आते-जाते रहते हैं। जब एनडीटीवी इंडिया की टीम जेल पहुंची तो पता चला कि वो दिल्ली से लौटे हैं। पुलिस को उम्मीद है कि उप्रित इस घोटाले में स्टार विटनेस बन सकते हैं। क्योंकि उनके जरिए पुलिस निजी कॉलेजों में डीमैट के जरिए हो रही भर्तियों के साथ व्यापमं को जोड़ सकती है।

इन निजी कॉलेजों में दाखिले का तरीक़ा भी काफ़ी दिलचस्प बताया जा रहा है।

- पीएमटी कोटे से होने वाली भर्तियां पैसे देकर ख़ाली करवा ली जातीं।
- छात्र अक्सर फीस ज़्यादा होने की दलील देकर एडमिशन नहीं लेते।
- 30 सितंबर तक सीट ख़ाली रहने पर डीमैट या पीएमटी की निचली रैंक के लिए रास्ता खुल जाता।
- इस सिलसिले में पुलिस ने दो छात्रों को भी गिरफ़्तार किया जो दो बार पीएमटी में बैठे।
- हालांकि दोनों ने पहली बार अपनी सीट निकाल ली थी।
- इनमें से एक ग्वालियर मेडिकल कॉलेज का है और दूसरा आगरा मेडिकल कॉलेज का।

दरअसल, निजी कॉलेजों में 50 फ़ीसदी सीटें पीएमटी के ज़रिए भरी जाती हैं और 50 फीसदी डीमैट के ज़रिए। ये पूरी कहानी उलझी हुई है और इसमें कई किरदार हैं। कुछ ने पैसा देकर सीट हासिल की, कुछ ने सिस्टम से चोट खाई, कुछ परिवारों ने पैसा उधार लिया अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए और कुछ ने अपने बच्चों के लिए लड़ाई लड़ते हुए जान भी गवां दी।

इंदौर के जावरा कंपाउंड में एक मां रहती है, जिसके बेटे को इंदौर के सबसे बड़े वीआईपी कॉलेज अरबिंदो कॉलेज में दाखिला नहीं मिला। वो कैमरे पर तो नहीं आई, लेकिन उसने बताया कि उसके पति ने इस सिलसिले में कोर्ट में एक मानहानि याचिका भी दायर की थी। वीके जैन ने अपने बेटे के लिए ये लड़ाई लड़ी, लेकिन अर्ज़ी देने के बाद उनकी मौत हो गई। ये 2005 का मामला है- व्यापमं के सबसे शुरुआती दौर का किस्सा। मामला अब भी अटका पड़ा है।

इंदौर वाले कहते हैं, यहां मेडिकल सीटें बिकती हैं। मेरिट में आने के लिए आपको 53 लाख देने पड़ते हैं और सिर्फ़ दाखिले के लिए 30 लाख। अब इस अरविंदो कॉलेज के मालिक विनोद भंडारी भी फ़र्जी दाखिलों के मामले में पुलिस की गिरफ्त में हैं। इस सारे घोटाले का जैसे एक पूरा तंत्र विकसित हो गया था, जिसमें नीचे से ऊपर तक सब शामिल थे।

कैसे चलता था ये गोरखधंधा...
- शुरुआत फ़र्जी एडमिट कार्ड बनाने से होती।
- परीक्षार्थी की जगह सवाल हल करने वाले की तस्वीर लगा दी जाती।
- एक सॉल्वर- यानी सवाल हल करने वाले को दो छात्रों के बीच बैठाया जाता।
- दोनों उससे नकल किया करते।
- इसमें परीक्षक भी शामिल होते।
- छात्र अपनी ओएमआर शीट ख़ाली छोड़ देते, जिन्हें बाद में परीक्षक भी भरा करते।

इस पूरे भ्रष्टाचार का एक पहलू और है। पूरी शिक्षा व्यवस्था नीचे से ऊपर तक जैसे बदहाल है। किसी को यकीन नहीं है कि वह अपने बूते कोई प्रतियोगिता निकाल लेगा। सबको शॉर्टकट की तलाश है। किसी को मेडिकल या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कुछ सीखना नहीं है। सबको एक सीट चाहिए, सबको एक नौकरी चाहिए। एक बार पैसे देकर ये हासिल हो जाए फिर घूस लेकर पैसे भी हासिल कर लेंगे।

दरअसल, व्यापमं ने भयानक शक्ल 2007 के बाद अख़्तियार की, जब राज्य सरकार ने सारी भर्तियों का काम इसी के हवाले कर दिया। कांस्टेबल, नर्स, शिक्षक, सब इंस्पेक्टर, सब इसी के ज़रिए आने लगे। कुल 40 महकमों की नियुक्तियां व्यापमं के ज़रिए होने लगीं। सबसे ज़्यादा धांधली मेडिकल, सब इंस्पेक्टरों और शिक्षकों की भर्ती में हुई। पुलिस की मानें तो हर इम्तिहान के लिए अलग-अलग माफिया गैंग बन गए। खुलेआम दुकानें खुल गईं जहां पोस्ट खरीदे-बेचे जाने लगे। राज्य का पूरा सिस्टम इन गिरोहों की मदद के लिए तैयार रहता। ऐसे ही अब हज़ारों लोग इस मामले के आरोपी नहीं बन गए हैं।

अब मिलते हैं उन हिम्मतवालों से जिन्होंने ये लड़ाई शुरू की...
26 साल के आशीष चतुर्वेदी को ग्वालियर में जैसे हर कोई जानता है। आख़िर इसी नौजवान ने व्यापमं को सीधे राज्य के मुख्यमंत्री से जोड़ा। हालांकि अब उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं। आशीष के मुताबिक इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री से जुड़े 17 लोगों के नाम सामने आ चुके हैं। आशीष चतुर्वेदी के अपने कई जायज़ सवाल हैं जो मुख्यमंत्री को असुविधा में डालते हैं।

उनका कहना है
- 2008 से 2011 के बीच शिवराज सिंह चौहान ख़ुद मेडिकल और शिक्षा के मंत्री रहे, तब भी क्या उन्हें घोटाले के बारे में पता नहीं चला?
- क्या राज्य के ख़ुफ़िया महकमे, पुलिस विभाग किसी ने उन्हें कुछ नहीं बताया?
-मध्य प्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव तो इस मामले के सीधे आरोपी बना दिए गए हैं।
-इस मामले में वो भी शामिल हैं, ये राज़ एक दूसरे शख्स आनंद राय ने उजागर किया।
-राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा इस मामले में जेल की सलाखों के पीछे हैं।
-उनके दोस्त और सबसे बड़े बिचौलिया माने जाने वाले सुधीर शर्मा और पंकज त्रिवेदी भी आख़िरकार गिरफ़्तार हैं।
-ये दोनों लोग बीजेपी और संघ नेताओं के काफी करीब माने जाते हैं।
-कांग्रेस का आरोप है कि आरएसएस ने अपने कई लोगों को व्यापम के ज़रिए नौकरी दिलवाई।

2013 में जब तक ये घोटाला सामने आया, तब तक 1000 से ज़्यादा मेडिकल सीटों पर फ़र्जी दाखिले हो चुके थे। दूसरे महकमों में भर्तियों का यही हाल रहा। अब लोग निलंबित किए जा रहे हैं, गिरफ़्तार हो रहे हैं, आरोपी बनाए जा रहे हैं।
हज़ारो लोग आरोपी हैं, सैकड़ों लोग जेल में हैं। लेकिन नौजवान पीढ़ी एक नई मुश्किल झेल रही है। भर्तियां रुकी हुई हैं और लड़के तय नहीं कर पा रहे कि वे क्या करें, कहां जाएं। इम्तिहानों के बाद नतीजों का इंतज़ार जैसे ख़त्म नहीं हो रहा।

हमें इंदौर की सड़कों पर ऐसे कई नौजवान मिले। एक नौजवान जिसने पब्लिक सर्विस कमीशन का परचा दिया उसने बताया "मैं पिछले दो सालों से अपने 2013 के रिजल्ट का इंतज़ार कर रहा हूं।"

एक मेडिकल की छात्रा ने कहा "हमें समझ नहीं आ रहा पैसा कोचिंग के लिए खर्चे या फिर घूस देने के लिए संभालें।"  

उसकी सहेली का कहना था "मैंने एक नंबर के कारण अपना एक साल ख़राब किया। वह कौन वापिस करेगा।"

व्यापमं दरअसल यह भी बताता है कि हमारे मिडिल क्लास जीवन में भ्रष्टाचार किस हद तक घुसपैठ कर चुका है। तकनीकी पढ़ाई के लिए, छोटी-मोटी नौकरियों के लिए किसी भी तरह के जुगाड़ से किसी को परहेज नहीं है। पूरे तंत्र में जैसे घुन लगी हुई है। ऐसे में कालीन हटी तो ऊपर से नीचे तक की हकीकत खुलकर सामने आ गई।

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